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वाह! रे पैसा

                
                                                         
                            वाह रे! पैसा, वाह रे! पैसा
                                                                 
                            
रूप तेरा मणि-रत्न जैसा,
हो चाहे गंदा या हो मैला,
लोग रखें जैसा, वैसा पैसा।
क्या कमाल कर रखा है तूने,
आदम के दिमाग पर ऐसा।

वाह रे! पैसा, वाह रे! पैसा
वाह रे! पैसा, वाह रे! पैसा

खिलते हैं चेहरे रोते हुए,
बनते हैं रिश्ते टूटे हुए।
माना कि पैसा ऐसा है,
जिसका न कोई जैसा है।

वाह रे! पैसा, वाह रे! पैसा
वाह रे! पैसा, वाह रे! पैसा

पैसा है तो ऐसा है
पूछते सब लोग — “तू कैसा है?”
मैं जैसा था, मैं वैसा हूँ,
अभिमानयुक्त, कटु-मुख सा हूँ।
वाह रे! पैसा, वाह रे! पैसा।

आशा है कि यह कविता आपके पाठकों को पसंद आएगी।
- परीक्षित शुक्ल
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 महीने पहले

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