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ज़ुल्फ़ों पर शायरी

Umair samar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं तिरे नाम ज़िंदगी करता
        
                                                    
                            
इस तरह तुझ से 'आशिक़ी करता

तू ने हक़ ही नहीं दिया वर्ना
तेरी ज़ुल्फ़ों पे शा'इरी करता

तू पिलाता अगर निगाहों से
फिर कहाँ इतनी मय-कशी करता

कुछ त'अल्लुक़ तो फिर भी रह जाता
वो अगर मुझ से दुश्मनी करता

गर हक़ीक़त मैं जानता उन की
मैं न फूलों से दोस्ती करता

कौन सा जुर्म रह गया था 'समर'
इस ज़मीं पर जो आदमी करता
-उमैर समर
एक घंटा पहले
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