मानव और मीन
पेट की क्षुधा शांत करने,
बढ़ता मानव तट की _ओर,
फेंक जाल या बंसी-कांटा,
प्रतीक्षा करता... भोर-विभोर।
कांटे में गुंथा वह दाना,
मीन को देता है निमंत्रण,
वह भी चली थी क्षुधा मिटाने,
पा लिया स्वयं का अंत-आलिंगन।
आए थे दोनों ही मिटाने भूख_ अपनी,
पर विधि का विधान कितना भारी था,
मानव के पास 'चारा' ही चारा था,
मछली का वह 'चारा' ही आखिरी था।
मीन को पाकर मानव,
अपनी ही भूख बिसराता है,
भूखी मरकर भी वह मछली,
मानव का पेट भर जाती है।
-बी.उदय किरन