इंसान सोचते थे और सोचके डरते थे
वो सोचते थे कि क्या जंग को रोका जा सकता था ?
और वो ये सोचकर रोया करते थे ..
मर्द अपनी मर्दानगी को किनारे रखकर अपनी स्त्रियों से
गले लगाकर रोते रहते
इंसान सोचते थे और सोचकर हमेशा भयभीत होते थे
वो लेबनान को देखते और देखकर डरते थे
वो जितना साउथ सूडान से डरते थे
इंसान उतना ही गाजा से भी डरते थे
वो हमेशा सोचते और सोचकर ये कहते
हम उन बच्चियों का क्या करें जिन्हें अभी शाम को घर लौटना था
बच्चे सोचते कि काश धरती तेल पे नहीं सिर्फ हवा पे चलती
तो कभी भी हम दफनाए न जाते , न मारी जाती पैदल चलती औरतें
इंसान जितना स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से डरते थे
वो उतना ही p.o.c se भी डरते थे
इंसान डरते थे और डर डर कर बाते करते थे
और बाते करते थे शायद से हथियारों की
या शायद से गाजा की
और हमास , हिजबुल्ला की भी
बच्चे अपनी मां को लिपट जाते थे और
भिगो दिया करते थे उनकी छातियों को अपने आंसुओं से
अगर कबीर की तरह सोचा जाए तो ये बच्चे भी ऐसे ही पैदा होते है
जैसे हम और आप
स्कूल की बच्चियों को देखकर गिद्ध भी डरकर सोचा करते थे कि
इंसान हमसे ज्यादा नीच हो सकता है
इंसान एक दूसरे को इस कदर गले लगाकर डरते थे
की कमीज में रही चश्मे के फ्रेम टूट जाया करती थी
इंसान सीजफायर को सुनकर खुश होते
और इंसानों को देखकर फिर डरते
वो डरते थे क्योंकि उन्हें डराया जाता था
बच्चे मदरसों में जाकर सिर पीटा करते थे
उनकी औरतें बिन मांगे पछाड़े खाती
पुरुष अपने होने पर डरते और डरकर रोते
वो सोचते कि एक के बार लिए ये जगह छोड़कर चले जाए
और वो ये सोचकर खुश होते
वो जितना इजरायल के ड्रोन से डरते थे उतना ही
अमेरिकी सिपाही से डरते थे
वो हर समंदर को पार करकर उस पार जाना चाहते थे
वो हर समंदर को देखते और देखकर डरते थे
इंसान को जितना और हारना समझ न आता था
और वो इस बात को लेकर चिंतित होकर रोते थे
हम क्या करे इस धरती का
जिसका होना शायद हमारे होने से है?
हम क्या करे इस समंदर का
हम क्या कर सकते है उन डरते बच्चियों का
जिनका नाम लरजिश - ए - तुफ़ुल है
कोहरे हुए सड़क पे बच्चे की लाशों को
फेका जाता है, दफना ने के लिए
तो धरती भी डरती है , उन्हें अपना ने के लिए
और इस कदर इंसान डरकर मार दिए जाते थे
और उनकी रूहे मरकर भी डरती थी
वो डरती थी कि काश और जी पाते तो क्या होता
और वो डरकर सो जाया करते थे ..!!