तेरा बहरूपिया बन के मुझको छले
बद्र की रात का चाँद तुझ-सा लगे
तेरे पट-छोर से मेरा आँचल-सिरा
ऐसे बाँधूँ कि सौ-सौ जनम ना खुले
टीस उठती है मेरे भी दिल में पिया
तेरे पग में अगर कोई काँटा चुभे
कोई दूजा ना मुझको चुरा ले कहीं
सात फेरों के बन्धन में रख लो मुझे
अब कहीं और जाने की चाहत नहीं
तेरी चौखट पे ही प्राण-दीपक बुझे
— त्रिशिका धरा