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बचपन की दुर्गा पूजा… अब सिर्फ़ यादें

Trishika Srivastava

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बचपन की दुर्गा पूजा किसी स्वप्नलोक से कम नहीं थी।
        
                                                    
                            
पंडाल की जगमगाहट मानो तारों की बरसात हो,
झालरों में लिपटा इन्द्रधनुष आँखों में उतर आता था।
ढाक की गूंजती थाप
दिल की धड़कनों से मिलकर
मन को अजीब-सी मस्ती में डुबो देती थी।
गुब्बारे, झूले, दोस्तों की खिलखिलाहट—
हर कोना जैसे जीवन का उत्सव बन जाता था।
अनजाने चेहरे भी अपने लगते थे,
भीड़ में खो जाने का डर नहीं था,
क्योंकि हर ओर अपनापन बिखरा रहता था।

लेकिन… समय के साथ सब बदल गया।
अब वही पंडाल सजे रहते हैं,
वही मूर्ति उतनी ही भव्य खड़ी रहती है,
ढाक की वही थाप गूँजती है—
पर मन अब वैसा नहीं झूमता।
भीड़ में होकर भी अकेलापन घेर लेता है,
झूलों की खनक अब शोर-सी लगती है,
झालरों की चमक आँखों तक तो पहुँचती है
पर दिल के अंधेरों को रोशन नहीं कर पाती।

माँ दुर्गा आज भी आती हैं,
सड़कों पर आज भी उत्सव की लहरें दौड़ती हैं।
पर बचपन में जो दीप भीतर जलते थे,
अब वे बुझ चुके हैं।
बाहर की रोशनी जितनी भी चमके,
भीतर का सूनापन उसे निगल लेता है।

दुर्गा पूजा अब सिर्फ एक त्योहार नहीं,
बल्कि बीते बचपन की दहलीज़ है—
जहाँ लौटने की चाह तो है,
पर लौट पाना सम्भव नहीं।

— त्रिशिका धरा
एक वर्ष पहले
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