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बेटी बचाकर क्या करें

Tilak Ram

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक दिन स्कूल से पढ़कर मैं घर को जा रही थी।
        
                                                    
                            
सोचकर अपनी सफलता मन ही मन मुस्का रही थी।
सोचती थी बड़ा ओहदा हासिल करूगीं भविष्य में।
हर बुराई को मिटाऊँगी जो आऐ भी दृष्ट में।
फिर हमारे गाँव में नये समाज का अवतार होगा।
हर तरफ होगी बधाई खुशी का त्योहार होगा।
कि अचानक तेजी से इक कार मेरे बगल आई।
डोर उसका खुला ज्यों होने लगी मेरी खिंचाई।
मैं अकेली राह सूनी कोशिशें करने लगी ।
छोड़ दो मुझको हे भाईया कह के मैं रोने लगी।
वासना में चूर मेरी एक भी न सुन रहे थे।
जिस्म को नोचेगें कैसे जाल मिलकर बुन रहें थे।
परमात्मा कहां हो तुम चमत्कार अपने कुछ दिखाओ।
कलयुग के दुःशासन से लाज मेरी तुम बचाओ।
चीख -चीख करके मैं दे रही सबको दुहाई।
बारी -बारी से सभी ने भूख अपनी खूब मिटाई।
हार कर वेसुध हुई स्पंदन कम था नाडियों में।
जाने क्या वो सोचकर मुझे फेक भागे झाड़ियों में।
होश में आई जब हिम्मत जुटा कर उठ रही थी।
खडी होती लड़खड़ा कर फिर धरा पर गिर रही थी।
किसी तरह घर तक गई तो पिता जी परेशान थे।
मेरे संग क्या-क्या हुआ हर बात से अनजान थे।
मैं ने सुनाई दास्तां तो आत्मा थर्रा गयी।
रोम -रोम सब खडे़ थे शर्म भी शर्मा गयी।
न्याय पाने के लिए लिखवाने जब रपट गये ।
पैर पकड़ कानून का पिता जी लिपट गये।
पर दरोगा जी मेरी रपट नही लिख रहें थे।
सामने मेरे ही वो गड़डी़यों में बिक रहे थे।
दूसरी तरफ से कुछ इस तरह बयान आया ।
आप मेरे जाति के हो यही जुमला काम आया।
थाने दार साहब आप ही इन्हे समझाइऐ।
मुवावजा देकरके इनको मामला सुलझाइऐ।
जवानी के जोश में लड़के से गलती हो गई हैं।
क्या करें लड़की भी इनकी अब जवान हो रही है।
कहिऐं इनसे बेटियों को पर्दे मे रक्खा करें।
पढने को स्कूल कॉलेज अकेले न भेजा करें।
मान जाओ तो इसी में ही तेरी भलाई है।
मना किया तो सब ने मिलकर बहोत की पिटाई है।
न्याय मुझको न मिला और पिता जी भी न रहें।
आज भी वो लोग मुझको हर समय धमका रहें ।
मुझको लगता है कि उनको हममें डर बिठाना था।
र्निभया को टारगेट कर सब में भय फैलाना था।
मौन है सरकार इसमें कुछ नहीं है कर रही।
जनता का क्या हैं वो तो अपने लिए ही मर रही।
दूसरो के दर्द से उनको मतलब है ही नहीं।
जुर्म को मिटाने की कोई तलब है ,ही ,नहीं।
क्या हुआ उनको किसी की अस्मिता जो लुट रही।
इंसान की इंसानियत अब जातियों में बंट रही।
शहर गाँवों और गली ,जनसभा और मॉल में ।
घूमते है भेंड़ियें अब आदमी की खाल में।
कही जलकर मरती हैं,कही लटकती हैं फासियां।
बेटी बचाकर क्या करें जब लुट रही हैं बेटियां?


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6 वर्ष पहले
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Dn Chaubey

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