दरिया तो देखा है,मगर उसके अंदर नहीं देखा,
सच कहूं तो आज तक मैंने समंदर नहीं देखा l
उसे गली में उसे जाते तो कई बार देखा है,
मगर आज तक मैंने उसे गाली के अंदर नहीं देखा l
लोगों से झूठ कहता हूं कि तेरा घर देखा है,
सच ये है कि मैं तेरा शहर भी नहीं देखा l
लोग कहते हैं ये इश्क नहीं हवास है तुम्हारी,
सच कहूं तो उसे कभी इस नजर से नहीं देखा l
तुम क्या हो अश्क तुम्हें मालूम नहीं शायद,
क्या तुमने आज तक अपने भीतर नहीं देखा l