आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नहीं देखा

                
                                                         
                            दरिया तो देखा है,मगर उसके अंदर नहीं देखा,
                                                                 
                            
सच कहूं तो आज तक मैंने समंदर नहीं देखा l

उसे गली में उसे जाते तो कई बार देखा है,
मगर आज तक मैंने उसे गाली के अंदर नहीं देखा l

लोगों से झूठ कहता हूं कि तेरा घर देखा है,
सच ये है कि मैं तेरा शहर भी नहीं देखा l

लोग कहते हैं ये इश्क नहीं हवास है तुम्हारी,
सच कहूं तो उसे कभी इस नजर से नहीं देखा l

तुम क्या हो अश्क तुम्हें मालूम नहीं शायद,
क्या तुमने आज तक अपने भीतर नहीं देखा l
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर