विज्ञापन

खेलो लड़कियों खेलो

Sushma Tripathi

Mere Alfaz
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            खेलो लड़कियों खेलो
        
                                                    
                            
तुम्हें देखने नहीं आती भीड़
तुम सब नहीं दिखती परदे पर
तुम बरसाती रही रन,
तुम पर अब तक नहीं हुई पैसों की बारिश
तुमको देखने फ्लाइट से नहीं जाता बॉलीवुड
मगर, तुम हो, तुम्हारी कोशिशें हैं
आगे, चुनौती है, मंजिलें हैं,
खेलो, कि तुम्हारे साथ खेलें
लड़कियाँ...शहर में, गली में,
मकान में, बरामदे में, रसोई में।
बेलन में दिखे बैट, रोटियों में गेंद।
और, आईने में चमचमाता कप।
और, जीतने की जिद, जिसे
संदूकों में तह करके बनारसी सा रख चुकी हैं।
खेलो मिताली, दिप्ती, पूनम, झूलन
खेलो हमरन, खेलो स्मृति
खेलो कि किसी धोनी, विराट, जडेजा
शास्त्री और सचिन सा नहीं बनना तुमको
खेलो, कि तुम्हारा रास्ता बस शुरू हुआ।
खेलो कि लड़कियों का रास्ता खुले
जो घर, रसोई से निकलकर मैदान तक जाए।
खेलो कि तह करके रखे सपने चमचमाए।
और, चमचमाते रहें।

 - हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all