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*व्यंग्य के आयाम*

Surya Kant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            *व्यंग्य के आयाम*
        
                                                    
                            
व्यंग्य के आयाम
यूं ही निखरते रहें।

संधान औ अनुसंधान,
मानव मन के
और तन के,
ताने-बाने से
संचालित हों
बुनते रहें।
हों कितनी भी
विद्रूपताएं ऑ
विसंगतियाँ,
चुटकियां या हो
कि चिकोटियां !
मर्यादा के लास्य में
बाण व्यंग्य के चलते रहें।

आज के युवा को,
दरकार है,
व्यंग्य के लोचन की,
मार्ग दर्शन
व्यंग्य का 'युवा भारत' को
यूं ही मिलता रहे।

साहित्य और
संस्कृति की बगिया में,
लहर व्यंग्य की,
तिस पर भी
बहर व्यंग्य
आलोचन की
मलयानिल सी बहती रहे।

तिस पर भी
बहर व्यंग्य
आलोचन की
मलयानिल सी बहती रहे।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा
2 घंटे पहले
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