भीगी हुई धरती
प्रकृति की गोद में
कभी थी भीगी हुई
धरती।
ख़्वाबों ख्यालों
ख़्वाहिशों की
शबनमी ओस से
थी कभी ये
भीगी हुई धरती।
अब तो मानव की
लिप्सा के आतंक
से काँपती है धरती।
सियासी ऑ आतंकी
चालों को अब तो
भांपती है धरती।
मानव के स्वार्थ
औ सब कुछ अपने
अंगूठे के नीचे रखने
प्रवृत्ति को ताकती
है धरती।
युद्ध और केवल
युद्ध की बारूदी
धांस से,
धांसती है धरती।
कभी मानव
कभी उसकी
कंक्रीट प्रगति
से हांफती है धरती।
क्रुद्ध प्रकृति के नर्तन
जलवायु परिवर्तन से
काँखती है धरती।
कभी कभी तो
राग विराग
में चहकती और
बहकती थी धरती।
और तो और
श्रृंगार विरह
में कूकती थी
धरती।
-सूर्यकांत शर्मा