बदलता इंसान
मंज़र ओ पस मंज़र
पर हकूमत करता
इंसां बदलता जा रहा।
दौर -ए -तरक्की
औ तकनीक के इतिहास
लिखता जा रहा।
बाहरी दुनिया को
ताकत दिखाता
अन्दर से रीतता जा
रहा।
'उसी ' का बंदा
उसी के निज़ाम को
शह और मात की
शतरंजी बिसात में
नमूदार जा रहा।
कायनात को अपनी
मर्ज़ी -ए -खुदगर्ज़ी
की आलूदगी से
भरता जा रहा।
कुछ कहे जा रहे,
ये बदलता इंसान
क्या क्या हिमाकत
करता जा रहा?!
कभी लालच !
कभी धौंस?
तो कभी सियासती
फितरत से,
उसकी ज़मीं ओ
आसमाँ को
जहर से पाटता जा
रहा।
कैसा नादाँ है!?
जिस शाख पे बैठा है।
उसी को काट कर
ख़ुद ही ख़ुद को
आतिश ए दोज़ख़
में फेंकता जा रहा।
यूं तो दिख रहा
के इंसान बदलता जा
रहा,
पर गौर से देखिए तो
'उसी' का वली अहद
'उसी' का चमन
ज़िबह करता जा रहा।
-सूर्यकांत शर्मा