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असंभव कुछ भी नहीं

Surya Kant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            असंभव कुछ भी नहीं,,,
        
                                                    
                            

आत्मा परमात्मा के संयोजन में,
असंभव कुछ भी नहीं।
उसी का अंश तू
फिर क्यों कुछ भी
संभव नहीं।
साहस का हाथ थाम
बुद्धि का ले नाम
असंभव कुछ भी नहीं।
प्रारब्ध को भूल,
न दे मन को और
भाग्य के शूल।
तेरे पुरुषार्थ औ उत्साह की,
पा न सके कोई थाह,
तो असंभव कुछ भी नहीं।
कर्म और धर्म का ले
आश्रय,
सक्रियता और ईमान
का पहन कवच,
उतर तू रण में,
और देख कुछ भी तो
असंभव नहीं।
वसुधैव कुटुम्बकम् के
बरगद तले,
डाल डेरा,
कर्म और कर्म कर
फिर देख ना
असंभव कुछ भी नहीं।

इतिहास पलट
भूगोल पढ़,
विज्ञान की ज्योति में
स्वयं को परख,
असंभव कुछ भी नहीं।

कर्म कर
स्वप्न देख
यम नियम
जप तप
सब कर
और देख ना
असंभव कुछ भी नहीं।

सृजन कर
सकारात्मक बन
और फिर देख
असंभव कुछ भी
तो नहीं ।
-सूर्यकांत शर्मा
एक महीने पहले
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