मिट्टी के भी दीपक लेलो बाबूजी।
मेरे घर भी दीवाली है बाबूजी।
शाम ढले मैं भी कुछ घर ले जाऊंगा।
दिल बच्चों का रह जायेगा बाबूजी ।
त्यौहारों की रौनक सिर्फ विदेशों में।
भारत में तो राजनीति है बाबूजी।
डोकलाम तो घड़ी-घड़ी चिल्लाते हो।
बंगले पर फिर चीनी लडियाँ बाबूजी।
अपनापन-अपनत्व बहुत ही मंहगा है।
तुम चीनी सामान उठा लो बाबूजी।
हम लोगों की क्या कोई दिवाली है?
दीपक भी है खाली-खाली बाबूजी।
सुरजीत मान जलईया सिंह
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