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तन्हाई

Surjeet

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तन्हाई कोई सज़ा नहीं, एक साथी है,
        
                                                    
                            
भीड़ में जो खो गया, उसी की थाती है,
जब सब चले जाते हैं, तब ये पास आती है,
और खुद से मिलने की राह दिखाती है।

शोर में तो हर कोई अपना लगता है,
तन्हाई में ही पता चलता है, कौन अपना लगता है,
यहाँ कोई मुखौटा नहीं, कोई बहाना नहीं,
बस मैं हूँ और मेरा आइना है।

लोग कहते हैं, तन्हा हूँ मैं रोता हूँ,
मैं कहता हूँ, तन्हाई में ही तो खुद को बोता हूँ,
जो बीज भीड़ में कभी उग नहीं पाते,
वो इसी सन्नाटे में पेड़ बन जाते।

तन्हाई में ही तो कविता जन्म लेती है,
हर टूटी लय फिर से जुड़ने लगती है,
ये काटती नहीं, ये गढ़ती है इंसान को,
भीड़ से निकाल कर, खुद से जोड़ती है।
-सुरजीत क्रान्ति
2 घंटे पहले
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