खुदा भूखा है या इंसान ?
मस्जिद में अज़ान हुई है,
मंदिर में घंटी बजी है,
एक तरफ खुदा का नाम है,
एक तरफ भूख सजी है।
खुदा कहता है सब्र कर ले,
इंसान कहता है रोटी दे दे,
खुदा के नाम पर व्रत रखे,
भूख के मारे दम निकले।
खुदा के घर में दावतें सजी हैं,
इंसान के घर में थालियाँ खाली पड़ी हैं,
खुदा को छप्पन भोग लगे,
इंसान को एक वक्त की रोटी नहीं मिली है।
मैंने खुदा से पूछा – तू भूखा है क्या,
उसने कहा – मैं तो इंसान में बसता हूँ,
मैंने इंसान से पूछा – तू भूखा है क्या,
उसने कहा – मैं तो खुदा को ढूंढता हूँ।
खुदा भूखा है इज्जत का,
इंसान भूखा है रोटी का,
एक को सजदा चाहिए,
एक को निवाला चाहिए।
खुदा भी भूखा बैठा है,
इंसान भी भूखा बैठा है,
एक आसमान में भूखा है,
एक जमीन पर भूखा है।
थाली में एक ही रोटी है,
ऊपर खुदा, नीचे इंसान है,
तुम बताओ – अब हक किसका है,
खुदा भूखा है या इंसान ?
-सुरजीत क्रान्ति