भेद क्यों? - पिंडदान एक सवाल
बेटी ने जो मन का मीत चुना, तो क्यों उसे अपराध कहा,
बाबुल ने आँगन से उसके सारे निशान मिटा दिया कहा।
जीते जी ही पिंड-दान कर, रिश्ता तोड़ दिया गया,
बेटी होना ही क्या सच में उसका गुनाह कहा।
बेटा भी तो वही करे, तो कुछ दिन रोष दिखाते हैं,
फिर माँ के आँचल तले उसे वापस बुला लाते हैं।
समाज भी हँसकर कहता, लड़का है भूल गया,
बेटी के हिस्से में बस जीवन भर के ताने हैं।
भैया ने भी ब्याह रचाया, अपनी ही मर्जी से,
माँ ने उसे कुछ दिन बाद, लगा लिया था गरजी से।
उसके लिए तो सबने, ढोल नगाड़े बजा लिए,
मेरे हिस्से बस आँसू, और ताने ही सजा लिए।
एक ही कोख से जन्मे, एक ही आँगन में पले,
फिर क्यों राहें बँट गईं, क्यों ये बंधन जले।
एक को माफ़ी, दूसरे को सदा के लिए सजा,
ये कैसा न्याय है, ये कैसी तुला तले।
क्या इज्जत सिर्फ बेटी के कदमों में बसी है,
क्या पगड़ी बेटे की भूल से भी नहीं हिली है।
उसने जो माँगा था बस अपना जीवन-साथी,
उसकी खुशी को ही परिवार ने क्यों फाँसी दी है।
जिस बेटी को कल तक लक्ष्मी कहा था,
आज उसी को मृत मानकर त्याग दिया था।
जिसने पहली बार चलना यहीं सीखा था,
उसी दहलीज से सदा को निकाल दिया था।
बेटा-बेटी एक समान का नारा झूठा है,
जब तक मन में ये गहरा भेदभाव रूठा है।
बेटी को भी बेटे सा गले लगाना होगा,
तभी ये समाज सच में आगे बढ़ा होगा।
-सुरजीत क्रान्ति