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1- निर्दयी वक्त 2- सिसकता किसान

sunita dohare

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            1- निर्दयी वक्त 
        
                                                    
                            

सफेद लिबासों में छुपकर, घूम रहे हैं चोर
सत्य छुपाकर निर्लज्जों से, खुद ही मचाये शोर

खाली थाली गरीब की, ले सुधि उनकी कौन
बड़े - बड़े हैं सूरमा, जो रहते हरदम मौन

दुःख देने में पारंगत, होते हैं जो लोग
नियत चाल उनके लिए, खुद रचती दुर्योग

संसार होता जा रहा, भीड़तन्त्र का अंग
जिसे निगलती जा रही, बेईमानों की जंग

सागर प्यासा रह गया, नदी हो गई मौन
समय-समय की बात है, राह दिखाए कौन

मासूमों को कुचल कर, हत्या का अभियान
निर्दयी वक्त है दे रहा, अब अपनी पहचान

लगातार नैतिक पतन, घुट - घुट कर रोता देश
दूर - दूर तक आस नहीं, कैसे बदलेगा परिवेश


दिल घबराता देखके, मयखाने की रौनक
रोक सको तो रोक लो, जाने वाली दौलत

2- सिसकता किसान

आतप, वृष्टि, शीत चले, आये ऑंधी या तूफ़ान
सौ - सौ दुःख सहने वाला, करता कार्य किसान

चरण पूजिए भूमिपुत्र के, जो रहता नंगे पाँव
खेत जा रहे हलधर के, सब उजड़ रहे हैं गाँव

जो चेतन सृष्टि का पालन करे, उसका नाम किसान
विश्व चाहें फिर कुछ कहे, पर मैं कहती भगवान

उगे करेले नीम पे, यूँ हुई निमौरी हलाल
काला कौवा कांव करे है, बनके उसकी ढाल

गेहूँ, सब्जी, दाल आदि, हरियाली से झूमे धान
भरी दोपहरी में न थकता, ये धरती का भगवान

हलधर हिम्मत ना हारना, ले भारत का नाम
नतमस्तक हो बारम्बार, मैं करती तुम्हे प्रणाम



सुनीता दोहरे
प्रबंध सम्पादक / इण्डियन हेल्पलाइन न्यूज़
महिला अध्यक्ष / शराबबंदी संघर्ष समिति


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7 वर्ष पहले
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Pankaj Sharma

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