ना ही मेरा पता बदला है और ना ही विचार
अपरिवर्तनीय हैं,
बहुत सरल सा पता है मेरा
मालदेवता
देहरादून
प्रकृति का सानिध्य
संवाद,संवेदना और सृजनशीलता,
विस्तृत वर्णन करूं तो
हरे-भरे पेड़ों से लकदक देहरादून से मालदेवता की ओर जाती हुई चौड़ी सड़क,
सड़क पर ही पुल से पहले
एक पहाड़ी बाजार
बाजार के एक तरफ
प्राचीन शिव मंदिर,
बाजार से समोसा ,जलेबी की खरीद
आगे जाते हुए
बांदल नदी और सौंग नदी के संगम के ऊपर पुल,
पुल से आगे
पहाड़ों के ओट अवगुंठित
चाय की टपरीयों के अंबार,
टपरी में कुल्हड़ वाली चाय बेचता पहाड़ का आदमी,
चाय की चुस्की के साथ
मेरी उस पहाड़ी से बातचीत
बातचीत में,
दरकते पहाड़ और गरजती बारिश में उसकी गांव से टपरी तक आवाजाही,
फसल ,घर,रोजगार और आमदनी ,
बीच-बीच में रुकते-रूकते
पहाड़ के विहंगम दृश्यों की मेरे द्वारा फोटोग्राफी
कुछ पते और विचार
बहुत आत्मीय होते हैं
किसी भी परिस्थिति में नहीं बदलते