मैं जहान कि चीज को जहान का ही लिखूंगी।
पेड़ों से जो हवा में लहराते हैं ,
उन पत्तों को मै जहान कि मुस्कान लिखूंगी ।
जो खिलकर सबको महका दे,
उन फूलों को जहान के हाथ लिखूंगी।
जो अदृश्य होकर भी हर कोने को छू जाती है,
उस बहती हवा को संसार कि सांस लिखूंगी।
और जब गुजरे वो पेड़ों के बीच से होकर,
तो उस सरसराहट को में जहान कि आवाज लिखूंगी।
जो थामे खड़ी है हर एक कली को,
उस टहनी को में जहान कि कलम लिखूंगी।
और जिस पर बिखरती है औंस कि बूंद,
उस हर एक पत्तों को उसकी किताब का पन्ना लिखूंगी।
कि जब भी में लिखूंगी तो कुदरत की हर एक चीज को कुदरत का ही लिखूंगी