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ख़ाली कोख का बोझ

SUNIL NAYI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अस्पताल की
        
                                                    
                            
सफ़ेद रोशनी में
दो चेहरे थे,
और दो नाम
जिन्हें लेने से
डरते थे हम।

मैंने दोनों की
कलाई देखी,
एक पर
ख़ून से सनी
घड़ी थी,
दूसरी पर
कंगन थे।

लेकिन वो
राखी नहीं थी,
जो मैंने
कल बाँधी थी,
उसने मेरी
बाँह छुई—
शायद...
पूछ रही हो,
पहचाना?

मैंने सिर हिलाया,
बच्चों के
चेहरे धुँधले थे,
लेकिन कफ़न
कुछ बोल रहा था।

मैंने कहा,
चलो घर चलें।

बाहर शाम
उतर रही थी,
बरसती हल्की
बूँदों से,
धरती गीली हो
गई थी।

मैंने
पहली बार जाना,
ख़ाली कोख
भारी लगती है।
एक घंटा पहले
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