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ख़ाली कोख का बोझ

                
                                                         
                            अस्पताल की
                                                                 
                            
सफ़ेद रोशनी में
दो चेहरे थे,
और दो नाम
जिन्हें लेने से
डरते थे हम।

मैंने दोनों की
कलाई देखी,
एक पर
ख़ून से सनी
घड़ी थी,
दूसरी पर
कंगन थे।

लेकिन वो
राखी नहीं थी,
जो मैंने
कल बाँधी थी,
उसने मेरी
बाँह छुई—
शायद...
पूछ रही हो,
पहचाना?

मैंने सिर हिलाया,
बच्चों के
चेहरे धुँधले थे,
लेकिन कफ़न
कुछ बोल रहा था।

मैंने कहा,
चलो घर चलें।

बाहर शाम
उतर रही थी,
बरसती हल्की
बूँदों से,
धरती गीली हो
गई थी।

मैंने
पहली बार जाना,
ख़ाली कोख
भारी लगती है।
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48 मिनट पहले

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