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बेचैन ... राम- रहीम

sunil khokhar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इधर राम बेचैन है
        
                                                    
                            
उधर रहीम बेचैन है !!

राम के यहाँ, रहीम को खतरा
और रहीम के यहाँ, राम को खतरा !!

अजीब है, समझ नहीं पा रहे हम
न राम को
और न रहीम को !!

अरसो बीत गए, नहीं बटती घर घर
ईद पर सेवईंयां
और दिवाली पर मिठाइयां !!

सीखा था सभी धर्म-भगवान् एक है
फिर अचानक सभी अलग अलग कैसे हो गए
ईश्वर-अल्लाह एक और धरम अलग अलग हो गए !!

आओ सभी एक हो जाएँ
और सब मिलकर राम-रहीम को बचाएं !!

कुछ तुम करीब आओ, कुछ हम करीब आएं
आओ मिलजुल कर राम-रहीम का देश बनायें !!
 
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करे
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