तारों वाला गजरा सजाकर
निशा आई इठलाकर,
माथे पर धरे चाँद की बिंदी—
धीमे-धीमे वह मुसकाई।
झींगुरों ने प्रथम सुर छेड़ा,
पेड़ों ने पत्तों का संगीत जगाया,
फूलों ने भी ओस में भीगकर
रात के आँगन को महकाया।
नदी ने जब अपना दर्पण खोला,
माथे का चाँद दमक उठा,
निशा लजाकर सिहर उठी,
लहरें पायल बाँध थिरक उठीं।
-सुजाता चक्रवर्ती