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धूप में शाम कर बैठे

Sudhir Khatri

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कर बैठे
        
                                                    
                            
नादान थे हम,
अपने इश्क़ पर,
गुमान कर बैठे,

आइनों के शहर में,
धूप में शाम कर बैठे,

ख्वाब नीलाम हुए,
बज़्म-ए-इश्क़ कैसे,
हम अपने इश्क़ का
बाज़ार आम कर बैठे,

मैं तो दीप हूँ,
कातिल अंधेरों का,
हवाओं को खिलाफ कर बैठे/कवि खत्री
10 घंटे पहले
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Updesh Kumar

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