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धूप में शाम कर बैठे

                
                                                         
                            कर बैठे
                                                                 
                            
नादान थे हम,
अपने इश्क़ पर,
गुमान कर बैठे,

आइनों के शहर में,
धूप में शाम कर बैठे,

ख्वाब नीलाम हुए,
बज़्म-ए-इश्क़ कैसे,
हम अपने इश्क़ का
बाज़ार आम कर बैठे,

मैं तो दीप हूँ,
कातिल अंधेरों का,
हवाओं को खिलाफ कर बैठे/कवि खत्री
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9 घंटे पहले

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