कर बैठे
नादान थे हम,
अपने इश्क़ पर,
गुमान कर बैठे,
आइनों के शहर में,
धूप में शाम कर बैठे,
ख्वाब नीलाम हुए,
बज़्म-ए-इश्क़ कैसे,
हम अपने इश्क़ का
बाज़ार आम कर बैठे,
मैं तो दीप हूँ,
कातिल अंधेरों का,
हवाओं को खिलाफ कर बैठे/कवि खत्री
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