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चक्षु पैने

Sudher Mohan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जिन आंखोंं में सपनेंं हों,उनमें नींद कहां आती है,
        
                                                    
                            
संकल्प अधूरा हो तो, दूनिया भी ना ये भाती है,
संकल्प पूर्ण करने को जो, प्राण भी अपने छोड गए,
और देश के लिए तिरंगा, तन पे अपने ओढ गए,
ये देश ही उनका अपना था, उनकी आंखों का सपना था,
बारूद की गरमी में तपकर, उन्हे वंदेमात्रम जपना था,
हर एक आंख में भर जाती प्रतिशोध की उग्र ज्वाला,
जब छलनी होता है मेरे, भारत का रखवाला,
राजनीति की आंखों में, भूचाल दिख्ाा है अब थोड़ा,
महबूबा को छोड़ के मन, कुछ देश भावना से जोड़ा,
टिकी है सत्ता के निर्णय पर, देश विदेशों की आंखें,
अब आतंकवादी करें समर्पण, पत्थर बाज यहां कांपे,
राजनीति की आंखोंं में, जब देश प्रेम छा जाएगा,
तब भारत मां की आंखों का, सपना पूरा हो जाएगा,
छोटी-छोटी आंखों वाला भी, आंख्ाा दिख्ााता था हमको,
छीना झपटी के संग-संग ही, नित धमकाता था हमको
एक बार आंख दिख्ााई उसे, वो नींद से अपनी जाग-गया,
भारत की सीमा से तो क्या, वो डोकलाम से भाग-गया
अब चाैकीदार के चक्षु पैने,धृतराष्ट्र का राज नहीं,
उसको बस समसान मिलेगा,जो आएगा बाज नहीं

- सुधीर मोहन शर्मा

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