माथे की हर शिकन से बनती हैं ये कविताएं।
क्रोध की हर एक तपन से तप्ती हैं ये कविताएं।
मां की ममता की पवन से बहती हैं ये कविताएं।
ईर्ष्या की भी जलन से जलती हैं ये कविताएं।
देश प्रेम और वतन से निकलती हैं ये कविताएं ।
शहीदों के लाल कफन से टपकती हैं ये कविताएं।
उनके अपनों के रुदन से सिसकती हैं ये कविताएं।
टूटती आस और स्वप्न से जन्मती हैं ये कविताएं।
धरती सागर और गगन से बरसती हैं ये यह कविताएं।
प्रेम की पावन छुअन से जनमी हैं ये कविताएं।
कवि के चुने वरन से बनती हैं ये कविताएं।
स्वरचित 'सुधा 'अपनी कलम से लिखती हैं ये कविताएं।।