देखा ! सड़क पर
हवा झोंके संग ,
खर-खरराते पत्ते
कभी इधर से उधर
ढकेलाते पत्ते ,
गिरकर टहनियों से
पतझड़ के
पीले पत्ते !
हाँ ! नजर उठी तरूवो पर
आभास हुवा यह माघ मास हैं
पतझड़ की ऋतु हैं आयी
वसंत लिय पास हैं
पियराये पत्ते तरुओं के
छोड़ रहे जीने की आस हैं
नये सृजन की तैयारी हैं
छूट रहा टहनी का साथ हैं
पतझड़ की ऋतु हैं आयी
पल्लव लिये प्रपात हैं ॥
पल्लव लिये प्रपात हैं ॥
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