विज्ञापन

मन का भार

subhash yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इकट्ठा करता हूँ
        
                                                    
                            
अपनी हार को सम्भाल कर ,
मन की गठरी में
कस कर बाँधकर ,
ढोता हूँ हर दिन
बोझ कि तरह
सच कहूँ तो
जिसे उतारना नही चाहता ,
क्योंकि जिद मेरी भी हैं
भार पर भार लाद लेने की
संघर्ष पथ पर
जीने- मर जाने की ,
जबतक की पाई -पाई
का हिसाब न मिल जाये
मुझे अपनी मंजिल से॥

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dr fouzia

6854 कविताएं

View Profile

RATAN KUMAR

613 कविताएं

View Profile