अपने आप से ही द्वन्द करती
मन की अन्तरंगे
हर -दिन हर- पल
लड़ती -झगड़ती
बन लाचार जिन्हे
कुछ कह नहीं सकता
आखिर सुनने को तैयार नहीं
किसी मुद्दे पर
कोई बात मेरी ,
जिनकी अकुलाहट देख
सोचता हूँ बैठ जाऊँ कुछ पल
किसी निर्जन
जगह छुपकर
पर कोलाहल मचातीं वहाँ भी
अन्तरंगे
बेचैन करती मन को
फिर जाऊँ तो कहाँ जाऊँ ?
-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।