अटक गई है गेंद कोई
बादलों में फंसकर कर
जा पहुँची माँ देखो
बादलों में अटक कर
क्या ऐसी डोर कोई
है जिससे बाँधकर ?
लें आये धरा पर
फिर जिसे उतारकर !
माँ बोली, यह चाँद है नभ का
गेंद नहीं किसी की
खिलौने सी चाँद लगती
यह देन है प्रकृति की ॥
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।