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कागज़ की कश्तियाँ

Subhash Thakur

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस बरसात में भी बनाएंगे हम कागज़ की कश्तियाँ
        
                                                    
                            
जैसे बनाते हैं हर साल कागज की कश्तियाँ
ढूंढ कर कुछ पुराने कागज़ों को
कुछ नये पन्नों को कॉपी से निकाल कर
कुछ नयी किताब की कविताओं के पन्नों से
कुछ कहानियों के पन्नों से कागज़ की कश्तियाँ
फिर मोड़ते हैं कागज़ को इधर से उधर
शायद भूल गए हैं बनाना कागज की कश्तियाँ
वो नखरे दिखाते हैं, थोड़ा परेशान करते हैं
जब पूछते हैं भैया से बनाना कागज की कश्तियाँ
फिर मोड़कर कागज को इधर से उधर
बनाते हैं भैया कागज की कश्तियाँ
छीन कर उनके हाथ से, दौड़ते हैं बाहर की ओर
और उतार देते हैं नालियों में कागज की कश्तियाँ
कुछ डगमगाती, लहरों पर उछल कूद करती
बढ़ चलती हैं तूफ़ान की ओर कागज की कश्तियाँ
बारिश के रुकते ही कश्तियों को ढूंढते हैं
लेकिन डूब गयीं हैं सारी कागज की कश्तियाँ
फिर सोचते हैं नहीं उतरेंगे हम
कभी तूफ़ान में कागज की कश्तियाँ

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4 वर्ष पहले
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