इस बरसात में भी बनाएंगे हम कागज़ की कश्तियाँ
जैसे बनाते हैं हर साल कागज की कश्तियाँ
ढूंढ कर कुछ पुराने कागज़ों को
कुछ नये पन्नों को कॉपी से निकाल कर
कुछ नयी किताब की कविताओं के पन्नों से
कुछ कहानियों के पन्नों से कागज़ की कश्तियाँ
फिर मोड़ते हैं कागज़ को इधर से उधर
शायद भूल गए हैं बनाना कागज की कश्तियाँ
वो नखरे दिखाते हैं, थोड़ा परेशान करते हैं
जब पूछते हैं भैया से बनाना कागज की कश्तियाँ
फिर मोड़कर कागज को इधर से उधर
बनाते हैं भैया कागज की कश्तियाँ
छीन कर उनके हाथ से, दौड़ते हैं बाहर की ओर
और उतार देते हैं नालियों में कागज की कश्तियाँ
कुछ डगमगाती, लहरों पर उछल कूद करती
बढ़ चलती हैं तूफ़ान की ओर कागज की कश्तियाँ
बारिश के रुकते ही कश्तियों को ढूंढते हैं
लेकिन डूब गयीं हैं सारी कागज की कश्तियाँ
फिर सोचते हैं नहीं उतरेंगे हम
कभी तूफ़ान में कागज की कश्तियाँ
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