तुझे गर्म हवाओं ने सताया है शायद,
मुरझाया चेहरा देखने की न आदत मेरी।
कटीली आँखों में तेरे रक्त के जो रेशे हैं,
बेवजह यूँ नहीं थकान की लकीरें हैं।
रूखी-रूखी सी जो आवाज़ सुनी है मैंने,
लगा कहीं खो गई है आवाज़ की नर्मियत।
लब खामोश हैं, मगर आँखें कह रही हैं,
किसी दर्द ने छीन ली है तेरी मुस्कुराहट।
पुष्प-सा कोमल कोई ज़ख्म मिला है तुझे,
फिर भी तूने उसे चुपचाप सह लिया।
दर्द को मुस्कान के पीछे छिपाकर रखना,
सच कहूँ—यही तो तेरी बड़ी ख़ूबी है।
मखमली गद्दों ने तेरे पाँवों के छालों से,
न जाने कैसी दुश्मनी निभाई है।
नर्म बिस्तर पर भी चैन न मिला तुझे,
शायद राहों ने कोई पीड़ा पुरानी जगाई है।
तेरे हर दर्द को पढ़ लेती हैं मेरी आँखें,
तेरी खामोशी भी मुझसे कुछ कह जाती है।
तू कुछ कहे या न कहे, फर्क नहीं पड़ता,
तेरी पीड़ा मुझ तक पहले पहुँच जाती है।
-सूबा लाल "अंजाना"