आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तेरे दर्द को पढ़ लिया

                
                                                         
                            तुझे गर्म हवाओं ने सताया है शायद,
                                                                 
                            
मुरझाया चेहरा देखने की न आदत मेरी।
कटीली आँखों में तेरे रक्त के जो रेशे हैं,
बेवजह यूँ नहीं थकान की लकीरें हैं।

रूखी-रूखी सी जो आवाज़ सुनी है मैंने,
लगा कहीं खो गई है आवाज़ की नर्मियत।
लब खामोश हैं, मगर आँखें कह रही हैं,
किसी दर्द ने छीन ली है तेरी मुस्कुराहट।

पुष्प-सा कोमल कोई ज़ख्म मिला है तुझे,
फिर भी तूने उसे चुपचाप सह लिया।
दर्द को मुस्कान के पीछे छिपाकर रखना,
सच कहूँ—यही तो तेरी बड़ी ख़ूबी है।

मखमली गद्दों ने तेरे पाँवों के छालों से,
न जाने कैसी दुश्मनी निभाई है।
नर्म बिस्तर पर भी चैन न मिला तुझे,
शायद राहों ने कोई पीड़ा पुरानी जगाई है।

तेरे हर दर्द को पढ़ लेती हैं मेरी आँखें,
तेरी खामोशी भी मुझसे कुछ कह जाती है।
तू कुछ कहे या न कहे, फर्क नहीं पड़ता,
तेरी पीड़ा मुझ तक पहले पहुँच जाती है।
-सूबा लाल "अंजाना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर