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अपनों के सुख-दुख में हरदम

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            घर नहीं इंसान बनाता,
        
                                                    
                            
बनता इंसान से घर है।
घर बना तो घर रह जाता,
इंसान नहीं रह पाता है।

ईंट-पत्थर जोड़कर कोई,
मकान खड़ा कर लेता है,
प्रेम-स्नेह के बिना मगर वह,
घर का सुख न दे पाता है।

धन-दौलत से सजता आँगन,
मन से घर सजता है,
रिश्तों में जब प्रेम न बचे,
हर कोना फिर खलता है।

बड़े भवन में रहकर भी जब,
मन भीतर से खाली है,
छोटे घर में प्रेम मिले तो,
वहीं खुशी मतवाली है।

घर की ऊँची दीवारों से,
रिश्ते ऊँचे नहीं होते,
संस्कारों की नींव जहाँ हो,
वहीं घर सच्चे होते।

घर को घर ही रखना हो तो,
इंसानियत बचाए रखना,
अपनों के सुख-दुख में हरदम,
अपना हाथ बढ़ाए रखना।

प्रेम स्नेह संस्कार परिश्रम,
धैर्य,मिलन,व्यवहार,लगन से
घर बना तो घर रहता है,
ऐसे घर को "अंजना"घर कहता है
-सूबा लाल "अंजाना"
4 घंटे पहले
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