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प्रकृति को भी प्यार चाहिए

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पेड़, पौधे, बाग-बगीचे, खेत और ये क्यारियाँ,
        
                                                    
                            
इनमें भी बसती हैं जीवन की प्यारी खुशियाँ।
इन्हें भी प्यार चाहिए, इन्हें भी चाहिए दुलार,
इनके भी मन में खिलता है, स्नेह भरा संसार।

जिस तरह मनुष्य को अपनापन अच्छा लगता है,
प्रेम भरा व्यवहार मिले तो मन भी महकता है।
उसी तरह पौधे भी स्नेह के भूखे होते हैं,
प्यार मिले तो हरे-भरे होकर ये हँसते हैं।

जब कोई इनकी सुधि लेने वाला नहीं आता है,
सूना-सूना इनका जीवन, मुरझाने लग जाता है।
न समय से पानी मिलता, न खाद और रखवाली,
धीरे-धीरे फीकी पड़ती हरियाली मतवाली।

फूलों की मुस्कान घटे, कलियाँ मुरझा जाती हैं,
फल देने वाली शाखें भी फल कम दे पाती हैं।
विकास रुक जाता है, बढ़ना भी थम जाता है,
उपेक्षा का असर प्रकृति पर साफ दिखाई देता है।

जिस बगिया में माली प्रतिदिन प्रेम लुटाता है,
सींच-सींचकर पौधों को जीवन-पथ देता है।
वहीं रंग-बिरंगे फूलों की महक बिखर जाती है,
भौंरों की गुनगुन से बगिया भी खिल जाती है।

खेतों में जब किसान पसीना अपना बहाता है,
धरती माँ की सेवा करके अन्न खूब उपजाता है।
बीजों में विश्वास जगाकर फसलें लहराता है,
मेहनत और प्रकृति के मेल से घर-घर अन्न पहुँचाता है।

छोटी-छोटी इन क्यारियों में सपने पलते रहते हैं,
नन्हे-नन्हे पौधे भी कुछ कहने को मचलते हैं।
कोई प्यार से पास खड़ा हो, इनकी सुधि ले जाए,
थोड़ा पानी, थोड़ी देखभाल, जीवन नया बनाए।

इनको केवल हरियाली का साधन न समझ लेना,
इनकी सेवा में जीवन का सुंदर दर्शन कर लेना।
इनके पत्तों, फूलों, फलों में खुशियों का विस्तार,
इनकी रक्षा करना भी है धरती माँ से प्यार।

पेड़ हमें छाया देते, फल और फूल खिलाते हैं,
शुद्ध हवा देकर जीवन की साँसें बचाते हैं।
वर्षा लाने, ताप घटाने में भी साथ निभाते हैं,
पशु-पक्षी और मानव को अपना घर बनाते हैं।

फिर क्यों इनको काट-काटकर अपना सुख खोज रहे हो?
अपने ही जीवन के रक्षक से मुँह क्यों मोड़ रहे हो?
जिनके दम पर साँसें चलतीं, जिनसे जीवन का आधार,
उनकी रक्षा करना सीखो, उन पर लुटा दो प्यार।

आओ, मिलकर प्रण यह लें, हरियाली बचाएँगे,
सूने आँगन, खेत, बगीचे फिर से खूब सजाएँगे।
एक-एक पौधे को अपने बच्चों जैसा पालेंगे,
प्रेम, दया और सेवा से धरती का मान बढ़ाएँगे।

याद रखो, प्रकृति रहेगी, तभी हमारा कल होगा,
पेड़ बचेंगे, जल बच पाएगा, जीवन भी निर्मल होगा।
प्रेम प्रकृति से करके देखो, सुख का खिले संसार,
धरती पर जीवन बनाए रखने का यही है सच्चा आधार।

पेड़-पौधों से प्रेम करो, इनका भी सम्मान करो,
जिस धरती पर जन्म लिया, उसका ऊँचा मान करो।
इनके सुख में सुख अपना है, इनसे ही जीवन का सार,
प्रकृति हमारी जीवनदाता—इससे कर लो सच्चा प्यार।
-सूबा लाल ‘अंजाना’
3 घंटे पहले
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