आज भी नज़रे ढूढ़ रही है उन अंजानी राहों को,
स्वप्न में जो देखा था हमने मुड़ मुड़ आती राहों में।
ऐसा भी होता है क्या कोई ख्वाब दुबारा आता है,
दिल को भी मजबूर बनाकर खुद में खोने को बताता है।
किस दुनिया में खो जाते थे,घूमते रहते थे हर पल
कहीं पे गंगा नदी थी दिखती कहीं सुनहरे से उपवन।
कही महल की अदभुत शोभा,बूढ़ा घूम दिखाता है,
उसी महल से सुंदर परियों के हाथ खीर भी खाता है।
स्वप्न की यह सुंदर सी कहानी मन को लगती थी प्यारी,
नित सोने के पहले दिल में ख्वाब ये सज जाती न्यारी।
नींद में खोते ही वो स्वप्न चल चित्र सा फिर चल जाता है,
रात्रि पूर्ण होने से पूर्व ही वापस घर को आता है।
-सूबा लाल "अंजाना"