रंग खोजकर परेशान हूँ,
कौन-सा रंग चढ़ाऊँ,
जिस रंग से इस दुनिया को,
आर-पार दिखलाऊँ।
ऐसा रंग हो जीवन में,
जिस पर रंग न चढ़ पाए,
शुद्ध भाव मन में रखकर,
अपने संग ले जाऊँ।
सच और कर्म प्रधान रहें,
कर्मों से सम्मान पाऊँ,
लोग जिन्हें अपनाकर खुश हों,
ऐसे कर्म कर जाऊँ।
प्रेम, संतोष, सत्य, समता,
मानवता का रंग चढ़ाऊँ,
जीवन के ये सुंदर मंत्र,
सबके बीच बाँट जाऊँ।
रंग सभी फीके पड़ जाएँ,
जब जीवन ढल जाएगा,
मेरे कर्मों का उजला रंग ही,
जग में शेष रह जाएगा।
तन मिट जाएगा, नाम मिटेगा,
मिट जाएगी हर चाह,
पर मानवता के रंग से रँगी,
छोड़ जाऊँ अपनी राह।
-सूबा लाल "अंजाना"