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न धन जाएगा, न पद जाएगा, न वैभव का अधिकार

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक प्यार है लालच का, जो आगे बढ़ता जाता है,
        
                                                    
                            
थोड़ा पाकर और अधिक पाने का मन बन जाता है।
बढ़ते-बढ़ते एक दिन इतना आगे निकल जाता,
उम्र गुजर जाती सारी, पर लालच न मिट पाता।

लालच का सागर गहरा है, इसका नहीं किनारा,
इसमें डूबा मानव खो देता जीवन का उजियारा।
धन-दौलत के मोह में पड़कर भूल गया व्यवहार,
जितना इस दलदल में धँसा, उतना मुश्किल पार।

कहाँ मिलेगा उद्धार उसे, जिसका लालच आधार,
ज्ञान का दीप जलाकर साथी, चुन ले सच्ची राह।
छोड़ दिखावे की दुनिया को, कर ले मन पर काबू,
प्रेम, दया, सेवा अपनाकर, बन जा सबका बाबू।

शान-शौकत सब रह जाएगी, रह जाएगा संसार,
धन के मद में अंधे होकर क्यों करता अत्याचार?
ऐसा प्रेम जगत में बाँटो, जो सबके मन को भाए,
तेरे जाने के बाद भी जग तुझको याद करे, गुण गाए।

सब कुछ यहीं रह जाएगा, कर्म चलेंगे साथ,
बुरे कर्म पर पछताएगा, रखकर माथे पर हाथ।
समय रहते चेत मनुज तू, मत कर जीवन बर्बाद,
आज सँभल जा, कल क्या होगा, किसको इसकी याद?

मत गिर इतना नीचे साथी, उठना कठिन हो जाए,
पाप-कर्म की राह पकड़कर जीवन व्यर्थ न जाए।
मानव तन अनमोल मिला है, इसका मान बढ़ाओ,
सत्य, प्रेम और नेक कर्म से जीवन सफल बनाओ।

न धन जाएगा, न पद जाएगा, न वैभव का अधिकार,
कर्मों की ही गूँज रहेगी, यही सत्य संसार।
लालच छोड़, परमार्थ चुन, मन में प्रेम जगाओ,
मानव जीवन मिला है तुमको—कर्मों से पार लगाओ।
— सूबा लाल ‘अंजाना’
एक घंटा पहले
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