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गरीब के आंसू

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नज़र जिधर भी जाती है,
        
                                                    
                            
वहाँ बेचारगी का धुआँ उठता है।
हर मोड़ पर बेरहमी की परछाईं,
हर चेहरे पर अनजाना दर्द लिखता है।

बेख़ौफ़ जुर्मों का अँधड़ है,
हर साँस में भय पसरा है।
जनता की आँखों में प्रश्न जले—
सुरक्षित जीवन कहाँ ठहरा है?

गरीबों के हिस्से सूखे आँसू,
अमीरों का धन सागर-सा बढ़ता है।
कहीं भूख से काँपता बचपन,
कहीं सोने का पहाड़ खड़ा है।

रिश्तों की नसों में स्वार्थ घुला,
अपनापन राख हुआ जाता है।
जिसे देखकर आँखें भर आनी थीं,
उसे देखकर मन पत्थर हो जाता है।

दया-ममता किस धुंध में खो गईं,
प्रेम का दीप कहाँ जलता है?
मनुष्य तो भीड़ में बहुत खड़े हैं,
पर इंसान भीतर से घटता जाता है।

अभी समय है—जागो सब,
रात का सीना चीर सकते हैं।
दिल में मानवता का दीप जलाएँ,
तो बिखरे संसार को फिर जोड़ सकते हैं।
— सूबा लाल “अंजाना”
एक घंटा पहले
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