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चाँद के इंतज़ार में

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज चाँद के इंतज़ार में,
        
                                                    
                            
बेकरार थे चेहरे बड़े।
चंद्रोदय से पहले ही,
बादल आकर बीच में अड़े।

तड़-तड़-तड़-तड़ बूँदें बरसीं,
आँगन को गीला कर गईं।
चाँद आएगा, यही सोचकर,
आँखें राह निहारती रहीं।

कभी इधर देखा, कभी उधर,
आस मन में जगती रही।
बादल चाँद को ढककर बैठे,
रात प्रतीक्षा में कटती रही।

कुछ तो अपनी देरी थी,
कुछ मौसम की नादानी थी।
साढ़े आठ बजे चाँद निकलना था,
पर बदली की मनमानी थी।

घड़ी की सुइयाँ बढ़ती जाएँ,
मन में धीरज टूट रहा।
व्रत की लंबी राह निहारें,
चांद मेघ में ढका रहा।

चाँद दिखे या न दिख पाए,
श्रद्धा अपनी कम न हो।
प्रेम, समर्पण और विश्वास का,
मन में दीप कभी मंद न हो।

बादल चाहे लाख घिरें,
आशा का आकाश रहे।
पति-पत्नी के पावन रिश्ते में,
प्रेम सदा आबाद रहे।
— सूबा लाल ‘अंजाना’
15 घंटे पहले
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