झूमते बादल रुक-रुक कर,
कभी यहाँ, वहाँ मंडराते हैं।
घूम-घूमकर चारों ओर,
काले बादल छा जाते हैं।
तूफ़ानों के साथ में चलकर,
विकराल रूप दिखाते हैं।
कई झोपड़ी, पेड़ - घरों को,
पल में ज़मींदोज़ कर जाते हैं।
लगातार बरसात की झड़ियाँ,
नाले-पोखर भर जाते हैं।
सड़कों के गड्ढे दिखते नहीं,
वाहन पानी में बह जाते हैं।
घरों में जब पानी भरता है,
परिवार दुखी हो जाते हैं।
कई-कई दिन भूखे रहकर,
आँसू पीकर समय बिताते हैं।
कई लोग बेघर होकर भी,
किसी तरह जान बचाते हैं।
पशु-पक्षी, राशन और कपड़े,
पानी में सड़कर रह जाते हैं।
कहीं फसलें डूब जाती हैं,
कहीं खेत उजड़ जाते हैं।
मेहनत से बोए बीज किसान के,
पानी संग बह जाते हैं।
ऐसे संकट की घड़ी में,
सब मिलकर हाथ बढ़ाएँ।
भूखे-प्यासे जन-जीवन को,
मिलकर भोजन-पानी पहुँचाएँ।
प्रकृति से छेड़छाड़ न करें,
वन-पेड़ सदा बचाएँ।
नाले-पोखर साफ रखें हम,
जल को राह दिखाएँ।
आपदा चाहे कितनी आए,
हिम्मत कभी न हारें।
मानवता का हाथ पकड़कर,
मुश्किल से मिलकर पारें।
— सूबा लाल “अंजाना”