आकाश चाँदनी से नहाया हुआ,
खामोश दिखाई देता है।
नीले रंग को निगल गया,
अब पूरा अँधेरा दिखता है।
सनसन करती हवा ज़मीं पर,
सूनी-सूनी चलती है।
आँखें फाड़कर देख रहा हूँ,
पर कहीं नज़र नहीं आती है।
छू जाती है शरीर को,
महका देती सारा मन है।
मैं हूँ तेरे आस-पास,
स्पर्श ये बता देती है।
“दिखती नहीं, फिर भी लगता है,
प्रकृति का यह अनमोल प्यार है।”
बिन बोले ही कह जाती है,
प्रकृति का अद्भुत संदेश है।
-सूबा लाल ' अंजाना '