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छू जाती है शरीर को, महका देती सारा मन है।

                
                                                         
                            आकाश चाँदनी से नहाया हुआ,
                                                                 
                            
खामोश दिखाई देता है।
नीले रंग को निगल गया,
अब पूरा अँधेरा दिखता है।

सनसन करती हवा ज़मीं पर,
सूनी-सूनी चलती है।
आँखें फाड़कर देख रहा हूँ,
पर कहीं नज़र नहीं आती है।

छू जाती है शरीर को,
महका देती सारा मन है।
मैं हूँ तेरे आस-पास,
स्पर्श ये बता देती है।

“दिखती नहीं, फिर भी लगता है,
प्रकृति का यह अनमोल प्यार है।”
बिन बोले ही कह जाती है,
प्रकृति का अद्भुत संदेश है।
-सूबा लाल ' अंजाना '
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
26 minutes ago

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