कितनी ही गहरी हो अमावस
थरथरा जाती है आख़िर
दीवार पर प्रकाशित होते ही एक दीपक
रचने वाले रच लें अनगिनत प्रपंच,
मारीच की माया कभी नहीं रच सकेगी
अंतिम जीत की छवियाँ
सत् का साथी आएगा जब अपनी पर
छिन्न-भिन्न कर देगा असुरों की राजधानी
और सच का सारथी तो आरूढ़ होगा ही
पुष्पक विमान पर।
धीरज धर!
कालजयी नहीं हो सकता कोई अँधेरा,
मन के दीए खँगाल
तो बिखर जाएँगे चारों ओर उजास के कण,
और ये कण बीनते समय
भूल मत जाना न्यौतना परस्या पाहुण।
याद रखना
तुम्हारे द्वार पर दीवाली उस समय ही मुस्कुराएगी
जिस समय बाँटना सीख जाएगा तू सही में बाँटना
अपने हिस्से का उजाला अपनों की ख़ातिर
और परायों के लिए भी उन्मुक्त।
परस्या पाहुण न्यौतना : दीवाली की रात दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में
सुहागिनें हर घर में दीप सजा हर द्वार पर एक-एक दीप रखकर आती हैं।
इसी रिवाज को परस्या पाहुण न्यौतना कहा जाता है।
अनुवाद : नंद भारद्वाज
हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।
लिंक पर क्लिक करें और जुड़ें अमर उजाला काव्य के व्हाट्सएप चैनल से
https://whatsapp.com/channel/0029VaXoA27A89Mp96alfc2o
कमेंट
कमेंट X