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तो मन पूछता है खुद से—वो संस्कार कहाँ दिखता है?

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जहाँ मिसालें सच्चाई की दिन-रातें दी जाती थीं,
        
                                                    
                            
ईमानदारी की कसमें बेखौफ ही खाई जाती थीं।
जहाँ न्याय की चादर भी बिछने पर कम पड़ जाती थी,
आज वहीं घने अँधेरे में कुछ भी नहीं दिखता है।
ढूँढ़ रहे हैं क्या वो भारत आज कहीं मिल पाएगा,
जिस संस्कृति के गुण गाए थे, क्या कोई गा पाएगा?
मान और सम्मान की गरिमा क्या कोई जी पाएगा?
नहीं, वो इतना नीचे चला गया, कुछ भी नहीं दिखता है।
सच की राह कठिन हुई है, झूठ सरल हो जाता है,
मेहनत करने वाला अक्सर पीछे ही रह जाता है।
ईमानदारों की राहों में काँटों का जंगल उगता है,
झूठ और फरेब का सिक्का हर बाजार में चलता है।
जिसके मन में छल नहीं है, उसको ही डर लगता है,
सीधा-सादा इंसान यहाँ कदम-कदम पर डरता है।
जिसने जीवन सत्य के बल पर जीने की ठानी है,
उसके हिस्से में क्यों इतनी कठिन कहानी आती है?
भ्रष्टाचार की बेल बढ़ी तो मूल्य सभी झुक जाते हैं,
सुविधा पाने के चक्कर में सिद्धांत बदल जाते हैं।
झूठे वादों, झूठे सपनों का बाजार सजा रहता है,
सच्चाई का दीपक जलता है, फिर भी धुआँ-धुआँ रहता है।
कभी अतिथि को देव समझकर घर में स्थान दिया जाता था,
दुख में पड़ोसी सबसे पहले अपना हाथ बढ़ाता था।
रिश्तों में अपनापन था, शब्दों में सम्मान रहा करता था,
आज स्वार्थ की आँधी में वह अपनापन कहाँ दिखता है?
माता-पिता का मान जहाँ जीवन का संस्कार रहा,
गुरु के चरणों में बैठना गौरव का आधार रहा।
अब धन-दौलत के आगे जब रिश्तों का मोल घटता है,
तो मन पूछता है खुद से—वो संस्कार कहाँ दिखता है?
फिर भी पूरी आशा है, अँधेरा स्थायी नहीं होगा,
सच का दीपक बुझ जाए, ऐसा कभी नहीं होगा।
एक-एक मन में ईमान का दीप जलाना होगा,
अपने भीतर के भारत को फिर से जगाना होगा।
न झूठ से समझौता होगा, न बेईमानी अपनाएँगे,
अपने कर्मों से भारत की तस्वीर नई बनाएँगे।
सच, सेवा, न्याय, प्रेम को जीवन में फिर उतारेंगे,
गिरते हुए मूल्यों को मिलकर फिर ऊपर उठाएँगे।
भारत केवल धरती नहीं, संस्कारों की पहचान है,
सत्य, अहिंसा, प्रेम, न्याय ही इसकी सच्ची शान है।
बदलाव की राह कठिन सही, पर राह अभी भी बाकी है,
जब तक साँसों में सच बाकी—भारत की आस बाकी है।
-सूबा लाल "अंजाना "
2 घंटे पहले
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