विज्ञापन

बेचैन दिल का सुकून

Sohrab Nayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            थका हारा एक मुसाफिर
        
                                                    
                            
बिस्तर पर जा लेट गया।
जब नींद ना आई उसको,
उठ बैठा कुर्सी पर,
रात के सन्नाटे में,
लिए चंद किताबें पढ़ने बैठा
अपने ही सवालों में वह
खुद से ही उलझा रहा।
घंटों रहा मगन किताबों में
कुछ हल मिल ना सका जब उनको
दरवाजा खोला और
जा बैठा छत पर
ठंडी हवा के झोंके खाकर
फिर भी सुकूं न आया जब मन को
चाँद की मद्धम रौशनी में
खूब निहारा तारों को
कुछ सोचा, कुछ देखा....
न जाने क्या देखा?
मुस्कराता नीचे आया
वज़ू किया , मुसल्ला बिछाया
सजदे में गिरा और रोता रहा
बस रोता रहा.... तौबा किया
तौबा किया... बस रोता रहा,
दिल का हर दर्द ढोता रहा।
जो राज़ छुपे थे सीने में,
आँखों से वो सब कहता रहा।
लबों पर बस एक दुआ रही
या रब! अब और नहीं......
आँखों से अश्कों की बारिश हुई।
दिल में जो भी थी बैचैनी,
जितने दाग थे सब धुल गए।
चेहरे पर चमक हुई अयां
रोया...... फिर मुस्कुराया
शायद तब जाकर
दिल ने फिर सुकूं पाया।
6 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dr Vikas

7 कविताएं

View Profile